चंद्रपुर (महाराष्ट्र):
जंगल और बाघों की धरती कही जाने वाली चंद्रपुर अब इंसान और वन्यजीव संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुकी है। पिछले 15 दिनों में जिले में लगातार बाघ हमलों की घटनाओं ने ग्रामीणों में डर और आक्रोश दोनों फैला दिए हैं। तीन दर्दनाक घटनाओं में दो लोगों की मौत और कई घायल हुए हैं। बाघों का यह न थमने वाला आतंक अब जिला प्रशासन और वनविभाग के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
पहला हमला — मूल मार्ग पर दुपहिया चालक पर बाघ का झपट्टा
चंद्रपुर से मूल की ओर जा रहे एक युवक पर अचानक झाड़ियों से निकलकर बाघ ने हमला कर दिया। युवक सड़क किनारे गिर पड़ा और गंभीर रूप से घायल हो गया। मौके पर मौजूद ग्रामीणों के चिल्लाने पर बाघ पीछे हट गया, जिससे युवक की जान बच गई, लेकिन उसकी हालत नाजुक बनी हुई है।
दूसरा हमला — खेतों के पास महिला पर हमला, मौके पर मौत
गोंडपिपरी तालुका के अंतर्गत अल्का पेंदोर नामक महिला खेतों के पास काम कर रही थी, तभी अचानक बाघ ने उन पर झपट्टा मारा। महिला की मौके पर ही मौत हो गई। इस हादसे के बाद गुस्साए ग्रामीणों ने गोंडपिपरी-तेलंगाना राष्ट्रीय महामार्ग जाम कर दिया और वनविभाग व प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। करीब 9 घंटे तक जाम जारी रहा।
तीसरा हमला — खेत में काम कर रहे किसान की जान गई
25 अक्टूबर को तालोधी वनक्षेत्र में 58 वर्षीय किसान वसुदेव वेथे पर बाघ ने हमला कर उनकी जान ले ली। वह अपने खेत में काम कर रहे थे जब यह घटना घटी। ग्रामीणों में इस घटना के बाद जबरदस्त भय का माहौल है।
लगातार बढ़ रही हैं बाघों की हलचलें
पिछले दो हफ्तों में गोंडपिपरी इलाके में कई बार बाघ देखे जाने की घटनाएँ सामने आई हैं। कई बार खेतों में काम कर रहे किसानों और उनके मवेशियों पर भी हमले हुए हैं। ग्रामीण अब खेतों में अकेले जाने से डर रहे हैं और कई इलाकों में रात में बाहर निकलना बंद कर दिया गया है।
जंगल सिमट रहे, संघर्ष बढ़ रहा
चंद्रपुर जिला देश में सबसे अधिक बाघों की संख्या वाला क्षेत्र है — यहाँ लगभग 250 से अधिक बाघ निवास करते हैं। लेकिन अब जंगलों के सिमटने और मानव बस्तियों के फैलने से बाघों के शिकार क्षेत्र घट गए हैं। पानी के स्रोत सीमित हैं, जिससे बाघ अब गाँवों, खेतों और सड़कों तक पहुंचने लगे हैं।
वनविभाग की मॉनिटरिंग, कैमरा ट्रैप और पेट्रोलिंग की गति बेहद धीमी बताई जा रही है। पिछले एक साल में बाघ हमलों में 37 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह टेरिटोरियल कॉन्फ्लिक्ट नहीं बल्कि “स्पेस लॉस” और “फूड स्ट्रेस” का परिणाम है।
ग्रामीणों की पुकार — “सुरक्षा चाहिए, सांत्वना नहीं”
स्थानीय लोगों का कहना है कि वे रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए जंगल किनारे काम करते हैं — तेंदूपत्ता तोड़ना, लकड़ी लाना या खेत की रखवाली करना। ऐसे में बाघों से सामना होना अब आम हो गया है। वन विभाग की रात की गश्त लगभग बंद है और कैमरा ट्रैप कई जगह निष्क्रिय पड़े हैं।
अब सवाल बड़ा है — संरक्षण या संघर्ष?
कभी बाघों का संरक्षण भारत की शान था, लेकिन अब वही बाघ इंसानों की जान के लिए खतरा बन गए हैं। सवाल बाघ के नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमजोरी का है। अगर हालात नहीं बदले, तो चंद्रपुर बाघ संरक्षण से अधिक मानव-बाघ संघर्ष का केंद्र बन जाएगा।


