महाराष्ट्र के श्रम विभाग में गंभीर फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है। राज्य के चार सहायक श्रम आयुक्त (ग्रुप-ए) पिछले सात वर्षों से बनावट प्रमाणपत्रों के आधार पर सरकारी पद पर कार्यरत थे। यह मामला एक महिला उम्मीदवार की शिकायत के बाद सामने आया।
महिला उम्मीदवार ने उजागर की फसवणूक
अश्विनी सकोरे ने 2018 में महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग (MPSC) की परीक्षा पास की थी, लेकिन उन्हें पद पर नियुक्ति नहीं मिली। वहीं, निलेश येळगुंडे, एन.के. कावले, मोसिन अनवर और ज़ैनब इफ्तिसाद काज़ी को नियुक्ति दी गई थी। ये अधिकारी क्रमशः मुंबई, अहमदनगर, नांदेड़ और छत्रपती संभाजीनगर में कार्यरत थे। काज़ी का अब निधन हो चुका है।
सकोरे ने सूचना का अधिकार (RTI) के तहत इन अधिकारियों के प्रमाणपत्र प्राप्त किए और पाया कि सभी दस्तावेज़ फर्जी थे। उन्होंने सरकार के निर्णय को चुनौती दी और कहा कि यदि ये लोग फर्जी दस्तावेज़ पर सेवा कर सकते हैं, तो उन्हें भी समान पद दिया जाना चाहिए।
उच्चस्तरीय जांच समिति गठित
इस गंभीर मामले पर तत्कालीन मुख्य सचिव डॉ. नितिन करीर की अध्यक्षता में समिति गठित की गई। इसमें अतिरिक्त मुख्य सचिव राजगोपाल देवरा, सचिव विनिता वेद सिंगल, वित्त सचिव एन. रामास्वामी और विधि व न्याय विभाग के सचिव सतीश वाघोले शामिल थे।
समिति ने सकोरे की नियुक्ति नहीं करने की सिफारिश की। इसके बाद सकोरे ने महाराष्ट्र प्रशासनिक न्यायाधिकरण (MAT) में अपील दायर की।
जांच में खुलासा हुआ फर्जीवाड़ा
न्यायाधिकरण के आदेश पर श्रम आयुक्त ने जांच की। इसके बाद यह तथ्य सामने आए:
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एक अधिकारी ने 2008-2013 के बीच 500 कर्मचारियों वाले उद्योग का अनुभव प्रमाणपत्र दिया था, लेकिन वह संस्था श्रम पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत नहीं थी और केवल 9 कर्मचारी कार्यरत थे।
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दूसरे अधिकारी ने अनुभव संबंधी जानकारी में असत्यता दी।
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तीसरे ने नकली “नॉन-क्रीमी लेयर” प्रमाणपत्र जमा किया।
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चौथे (दिवंगत) अधिकारी ने अस्तित्वहीन कंपनी का अनुभव प्रमाणपत्र दिया।
रिपोर्ट न्यायाधिकरण में प्रस्तुत की जाएगी
पुणे मंडल के अतिरिक्त श्रम आयुक्त शैलेंद्र पॉल ने पूरी जांच रिपोर्ट श्रम आयुक्त को सौंपी है। अब यह रिपोर्ट न्यायाधिकरण (MAT) में पेश की जाएगी। श्रम विभाग के उपसचिव स्वप्निल कपडनीस ने कहा कि “अगली सुनवाई में आगे की कार्रवाई की जाएगी।”


